जब श्री अक्रूर जी महाराज भगवान श्री कृष्ण एवं भाई बलराम जी को लेकर राजा कंस के आग्रह पर, वृन्दावन से मथुरा की ओर ले जा रहे थे, तो मार्ग में विश्राम हेतु, यमुना के किनारे रथ रोक कर स्नान करने की इच्छा हुई।

श्री अक्रूर जी बहुत बडे़ ज्ञानी और दिव्य शक्ति के रखवाले थे, लेकिन कभी कभी उनके मन में यह शंका उठने लगी की क्या श्री कृष्ण जी दुराचारी कंस का वध कर पायेंगे या नहीं।

इसी शंका से वशीभूत होकर जब उनके मन के विचार उनके चेहरे पर चिन्ता के रूप मे दिखाई देने लगे तो प्रभु गोपीनाथ जी ने सोचा कि चाचा की शंकाओं का समाधान होना चाहिये। जैसे ही श्री अक्रूर जी ने यमुना में डूबकी लगाई तो उनको पानी में भगवान श्री कृष्ण एवं उनके भाई बलराम जी के दर्शन हुये। उन्होनें मस्तक को बाहर निकालकर देखा तो दोनों भाईयों को रथ में ही विराजमान पाया।

श्री अक्रूर जी ने दौबारा डूबकी लगाई और तब प्रभु ने अपने चतुभु‍र्ज रूप के दर्शन उनको कराये। इतिहास में यह शायद पहला अवसर था कि भगवान श्री कृष्ण ने अपने इस विराट रूप के दर्शन किसी मानव को कराये या यह कहना सत्य होगा कि श्री अक्रूर जी महाराज ही एकमात्र मानव थे जिनको प्रभु के इस दिव्य रूप के दर्शन करने का पहला अवसर प्राप्त हुआ।

जिस स्थान पर श्री अक्रूर जी को दिव्य रूप के दर्शन प्राप्त हुये वहां पर एक घाट की स्थापना हुई जिसे ‘‘ श्री अक्रूर घाट’’ का नाम दिया गया और उसी स्थान पर एक धाम बनाने की योजना के अन्तर्गत एक मन्दिर की स्थापना श्री अक्रूर जी माहराज के वंशजों यानि बारहसैनी समाज ने की जो ‘श्री अक्रूर धाम’ के नाम से प्रसिद्ध है।

समय बीतता गया और श्री अक्रूर धाम की महिमा बढ़ने लगी। हजारों श्रद्धालु, प्रतिवर्ष मन्दिर में स्थापित प्रभु गोपीनाथ जी के दर्शनों को दूर दूर से आने लगे और उनके मन की इच्छाऐं पूरी होने लगी। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हाथरस के सुप्रसिद्ध रईस बारहसैनी–वैश्यों के अग्रगण्य लाला दौलत राम जी ने भगवान गोपीनाथ जी की पूजा के स्वत्वाधिकारी गुसाई जी के आग्रह पर मन्दिर के नाम वहां की सौ बीघा से अधिक जमीन खरीदी और एक–दो मन्दिर का निर्माण कराकर प्राचीन मन्दिर से भगवान की मुक्ति को वर्तमान मन्दिर में लाकर स्थापना की।
(बारहसैनी, जूलाई/अगस्त 1941, पृष्ठ 22)

इसी प्राचीन मन्दिर के समीप एक पंचमुखी हनुमान जी का मन्दिर बना हुआ है जिसकी महिमा भी अपरम्पार है।
जिस दिन श्री अक्रूर जी महाराज ने प्रभु के दिव्य रूप के दर्शन किये, उसदिन सूर्यग्रहण का दिन था। इसी कारण सूर्यग्रहण के दिन अक्रूर धाम में प्रभु के दर्शन करना और यमुना नदी में गोता लगाने से एक तीर्थ धाम की परिक्रमा करने के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है ऐसा पुराणों में लिखा है और आज भी इसकी बड़ी मान्यता है। देश के विभिन्न प्रान्तों से जो भगवान श्री कृष्ण जी के दर्शनों को वृज क्षेत्र में आते है, उनकी पूजा तभी पूर्ण समझी जाती है जब अक्रूर धाम में जाकर प्रभु गोपीनाथ जी के दर्शन कर लेते है। श्री अक्रूर धाम में प्रभु के दर्शनों से मन की हर इच्छा पूर्ण होती है।

श्री अक्रूर धाम का जीर्णोद्वार

सन् 1925 में श्री वैश्य बारहसैनी महासभा सप्तम अधिवेशन छाता के अवसर पर महासभा में एक प्रस्ताव पारित हुआ कि श्री अक्रूर जी के मन्दिर का प्रबन्ध तथा उसके प्रत्येक कार्य हेतु निम्नलिखित सज्जनों की एक उपसभा बनाई जाये तथा वह उपसभा अपनी रिपोर्ट शीध्र महासभा को भेज दे, ताकि उसका उचित प्रबन्ध हो सके।
श्री मिश्री लाल जी वकील, अलीगढ़ इस उपसभा के संयोजक नियुक्त हुए,
बाबू पन्नालाल जी वकील कानून परमर्शदाता तथा अन्य गणमान्य सदस्य।
(बाहरसैनी, जनवरी, 1925)
तदुपरान्त 1946 में श्री दुर्गाप्रसाद गुप्त जी का लेख बारहसैनी पत्रिका फरवरी, 1941, पृष्ठ 13/14 में पढ़ने को मिला।
श्री दुर्गा प्रसाद जी ने एम0 एस0 सी0, एल0 टी0, एल0 एल0 बी0 होने के बाद भी समाज सेवा के हेतु एवं अपने परिवार के नजदीक रहने के विचार से वृन्दावन के छोटे से म्युनिसिपल स्कूल में हेडमास्टर का पद स्वीकार किया।
आपके लेख के कुछ अंश इस प्रकार है:–
‘‘महासभा की बैठक में यह आवश्यक समझा गया कि अक्रूर कमेटी को पुन: जागृत किया जाये और यदि उचित समझा जाए तो उसका पुनर्निर्माण किया जावे। महासभा की ओर से एक डेप्युटेशन बा0 किशोरी लाल जी और बाबू जय नारायण साहब का सेवासंघ के उद्देश्य को लेकर वहां आया। फलस्वरूप एक कमेटी मथुरा और वृन्दावन नगर के विरादरी भाईयों को निर्वाचित करके गठित की गयी।
.............................................
निम्न पदाधिकारी नियुक्त हुये :–
बा0 राधा वल्लभ, बी0एस0सी0, एल0एल0बी0, वकील, मथुरा – सभापति
बा0 हरी प्रपन्न, एम0ए0, एल0एल0बी0, वकील, मथुरा – उपसभापति
बा0 दुर्गाप्रसाद गुप्त, हेडमास्टर, वृन्दावन – मन्त्री
मा0 हर स्वरूप, हेडमास्टर, ब्रह्यकुन्ड स्कूल, वृन्दावन – उपमंत्री
ला0 प्यारेलाल, चक्की वाले, वृन्दावन– कोषाध्यक्ष

इनके साथ दो लेखा परीक्षक और सात सदस्य नियुक्त हुए।
उस समय तक श्री अक्रूर धाम में एक लम्बी कोठरी में दो मूर्तियां विराजमान थी और चारों तरफ बाउन्डरी या दीवार नही थी।
श्री दुर्गाप्रसाद जी एवं अन्य सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों का ख्याल था कि एक बड़ी योजना बनाकर सभा के सामने रखें जिससे समाज का एकमात्र तीर्थस्थान समाज तथा देश के अन्य सभी व्यक्तियों को आकर्षित कर सके।

सबसे बड़ी समस्या जो कमेटी के सामने थी वह थी भूमि के स्वामित्व की, केवल दो एकड़ जमीन महासभा के नाम हो सकी, समस्त भूमि गोस्वामियों के नाम या ठाकुर जी के नाम है जिसे गोस्वामी रजिस्ट्री करने में हिचक रहे थे।
बारहसैनी पत्रिका, मार्च 1986 में पढ़ने को इस प्रकार मिला :–
(बारहसैनी महासभा का वार्षिक विवरण 1986)

श्री अक्रूर मन्दिर का गत कई वर्षो से महासभा का ध्यान जीर्णोहार कर एक अक्रूर आश्रम बनाने की ओर आकर्षित हुआ है और उसकी अपील रजत जयन्ती अधिवेशन में भी की जा चुकी है। हमारे आदि देवता श्री अक्रूर भगवान के मन्दिर के पास जो 50 एकड भूमि गुसाइयों के नाम या ठाकुर जी के नाम की है, उसके खरीदने तथा महासभा के नाम करने का प्रयत्न किया जा रहा है और दो एकड़ भूमि का ही बेनामा महासभा के नाम भी हो चुका हैं। मन्दिर के गुसाइयों ने शेष भूमि को 4500 रूपयों में देना भी निश्चय कर लिया है और बैनामा बाकी रहा है। शायद यह शीध्र हो जायेगा।
इसके पश्चात् बारहसैनी पत्रिका में अन्य स्थान पर पढ़ने को मिला कि गोस्वामियों ने जमीन महासभा के नाम पर करने से इन्कार कर दिया । इस कारण श्री अक्रूर आश्रम बनाने का बड़ा प्रोजेक्ट असफल हो गया।
कभी–कभी मन में यह विचार आता है कि हमारे पूर्वजों ने अपने इष्ट देव के ऐतिहासिक स्थान को क्यों इस प्रकार अनदेखा किया हुआ है। इतिहास बताता है कि हमारे समाज में बीसवीं सदी के प्रारम्भ में इतने इतने बड़े रईस थे कि वे 100 ऐसे भव्य मन्दिरों का निर्माण करने में समर्थ थे। लेकिन प्रभु की लीला निराली है। मन्दिर को भव्य बनाने की योजनायें कागज पर ही चलती रही और यद्यापि समाज के अग्रणी भाइयों ने इसे कार्यान्वित करने में कोई ढील नही दी फिर भी मन्दिर के जीर्णोद्धार का काम शुरू भी नही हो सका।
समय मे बदलाव आया, कानून बदल रहे थे। जमीदारी और साहुकारी के व्यवसाय जो हमारे समाज के प्रमुख व्यापार थे, कानून की चोट सह रहे थे और इसका प्रभाव समाज की खुशहाली पर साफ देखने को मिल रहा था।
अक्रूर जी के मन्दिर का जीर्णोद्धार के कार्य में बराबर अड़चने आ रही थीं । सन् 1958 के बारहसैनी पत्रिका में इस सम्बन्ध में फिर पढ़ने को मिला –

अक्रूर सम्बन्धी प्रस्ताव

(बारहसैनी, अप्रैल, 1958)
अ0 भा0 बारहसैनी महासभा की कार्यकारिणी की एक बैठक 4 अप्रैल 1958 को एटा में हुई तथा उसमे श्री दुर्गा प्रसाद जी गुप्त मंत्री, अक्रूर कमेटी वृन्दावन तथा संयोजक मा0 यादराम गुप्त के पत्र समिति के समक्ष रखे गये और निश्चय हुआ कि खंडित मूर्तियों का शीध्र जीर्णोद्धार किया जाए और इस कार्य के लिये धन एकत्रित करने के लिये बारहसैनी पत्र में अपील एवं लेख प्रकाशित किये जाएं तथा मंत्री एवं संयोजक अक्रूर कमेटी डेपूटेशन बनाकर भ्रमण करके धन संग्रह का कार्य करें।
अक्रूर भगवान की मूर्ति बनवाने का कार्यभार श्री सत्यपाल वाष्णे‍र्य, वैधराज एटा ने अपने ऊपर ले लिया तथा श्री कृष्ण जी की मूर्ति बनवाने का वचन श्री सुरेश चन्द गुप्त सुपुत्र महा0 रामचन् गुप्त अलीगढ़ ने दिया। अन्य कार्य के लिये निम्न व्यक्तियों ने दान देने की धोषणा की।

ऐसा प्रतीत होता है कि सन 50–55 के दौरान समाज में बहुत से परिवर्तन आ रहे थें। जमीदारी के उन्मूलन से और साहुकारी के क्षेत्र में अस्थिरता से धनाड्य परिवारों में चिन्ता व्याप्त हो रही थी । ऐसे परिवारों की अगली पीढ़ी इस नये परिवर्तन के लिये तैयार नही थी। एक तो शिक्षा का अभाव और ऊपर से चारों ओर से घेरती विषम परिस्थितियाँ समाज के आधार को ही हिला रही थीं
पिछले 40–45 वर्षो में अक्रूर धाम में कोई परिवर्तन नही आया या समझ लिजिए कि जीर्णोद्धार की बातें सुनाई देनी ही बन्द हो गई। सन् 1966 के बाद महासभा में भी हलचलों का अनुभव होने लगा, जो सम्पतियाँ महासभा ने अर्जित करके रखी थी उन्हीं पर कब्जा करने की बातें सोची जाने लगी। समाज सेवा का अर्थ बदलता नजर आने लगा था और समाज वाले भूल ही गये कि उनकी एक धरोहर श्री अक्रूर धाम के नाम से मथुरा–वृन्दावन के बीच में स्थापित है।

सन् 1997 का सम्मेलन - अक्रूरधाम

सन् 1997 मे फिर से समाज मे हलचल मची और 20 अप्रैल 1997 को सम्मेलन का आयोजन महासभा के माध्यम से अक्रूर धाम पर ही आयोजित किया गया। ध्यान रहे कि बीच के कई वर्षो मे महासभा बन्द हो चुकी थी और सन 1996 में इसको पुन: जीवित किया गया।
सम्मेलन में सभी स्थानों से समाज के प्रतिनिधि पहुँचे और संख्या की दृष्टि से आयोजन बहुत सफल रहा । समाज के नये उभरते धनाड्य व्यक्तियों ने मंच से खडे़ होकर बहुत से संकल्प लिये लेकिन जीर्णोद्धार किस प्रकार व्यवस्थित ढ़ग से करना है, इसपर किसी ने विचार नही किया। थोडे़ ही दिनों में सब भूल गये कि अक्रूर धाम में कुछ निर्माणकार्य भी होना है।

श्री अक्रूर धाम गोपीनाथ फाउन्डेशन की स्थापना

अखिल भारतवर्षीय श्री वैश्य बारहसैनी महाराजा के निवर्तमान अध्यक्ष श्री श्यामा चरण वार्ष्णेय की अगुआई में बहुत प्रतिष्ठित वार्ष्णेय बन्धुओं ने श्री अक्रूर धाम का दौरा किया और गहन विचार विमर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि श्री अक्रूर धाम का इस जीर्णोद्धार अवस्था के लिये पूरा समाज उत्तरदायी है और जबतक हमारी इस ऐतिहासिक धरोहर को एक भव्य रूप प्रदान नही किया जायेगा, श्री अक्रूरजी महाराज की विषेश कृपा की हम याचना भी नही कर सकते।

हमारे समाज में प्रेमभाव की कमी है अपने आपको दूसरो से ऊंचा समझने की प्रवृति, समाज में एकता की अनदेखी, कुछ न होते हुये भी अपने आपको एक धनाड्य समझने की भूल । क्या हमने कभी सोचा है कि यह हमारे कुछ अनजाने में हुये पापों का फल है। हमने अपने इष्टदेव को भुला दिया। श्री अक्रूर जी का मन्दिर एक धरोहर वृन्दावन के बीच स्थित है, हमारे पूर्वजों की एक थाती है, इतिहास मे समाज का नाम इसी धरोहर के कारण है । इन सबके होने के उपरान्त भी हम अपने अपने स्वार्थो में इस प्रकार खो गये कि हम भूल ही गये की हमारे इष्ट देव का कोई प्राचीन मन्दिर भी है। हमने अपने बेटों–बेटियों की शादी में जो श्री अक्रूर जी की ‘‘पैहरावनी’’ निकालने और मन्दिर के पुजारियों को देने का प्रचलन था वह भी भुला दिया। इन्हीं तथ्यों पर विचार विमर्श करने के उपरान्त यह संकल्प लिया गया कि श्री अक्रूर जी के प्राचीन मन्दिर का जीर्णोद्वार एवं उसी को एक प्रतीक रूप देने में हम कोई कभी नही छोड़ेगे।

इस प्रयोजन के लिये श्री मदन मोहन अपना वाले हाथरस के संयोजकत्व में एक श्री अक्रूर धाम निर्माण समिति का गठन हुआ । कार्य विशाल था और स्थानीय वाष्णे‍र्य बन्धुओं का पूर्ण सहयोग भी अपेक्षित था लेकिन जब वार्तालाप शुरू किये गये तो स्थानीय भाईयों मे भी नाराजगी देखने को मिली और समाज के अग्रणी भाईयों में भी उदासीनता देखने को मिली। महासभा के अथक प्रयासों से सभी वार्ष्णेय बन्धुओं एक प्लेटफार्म पर आकर इस बात पर सहमत हो गये कि एक ट्रस्ट बनाकर इस कार्य को पूर्ण किया जाये।

उपरोक्त समिति ने कई बैठकों का आयोजन किया ओर अन्त में 8 फरवरी, 2004 को वृन्दावन में हुई एक बैठक में ऐतिहासिक महत्व इस कार्य को सुव्यवस्थित ढ़ंग से करने के लिये ‘‘श्री अक्रूर धाम गोपीनाथ फाउन्डेशन’’ नामक सॅस्था की नीव ररवी और एक तदर्थ समिति का गठन किया गया जिससे सॅस्था को अखिल भारतीय स्तर पर विधिवत पंजीकरण कराया जा सके। इस समिति ने 28 मई, 2004 को दिल्ली में ‘‘ श्री अक्रूर धाम गोपीनाथ फाउन्डेशन’’ के नाम से पंजीकरण कराया और जिसका रजिस्टर्ड ऑफिस, दिल्ली में श्री श्यामा चरण वार्ष्णेय का निवास रखा गया।

श्री अक्रूर धाम गोपीनाथ फाउन्डेशन

इस सॅस्था के विधान के अनुसार समाज के सभी व्यक्तियों को तीन प्रकार की सदस्यता का प्रावधान दिया गया है।

1. आजीवन सदस्य

रूपये 2100/–

2. आजीवन विशिष्ट सदस्य

रूपये 5000/–

3. आजीवन संरक्षक सदस्य

रूपये 51000/–

अक्रूर धाम को एक तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिये समस्त वार्ष्णेय समाज कृत संकल्प है और प्रभु से हमारी विनती है कि हमें सद्बुद्धि दे ताकि हम अपने इष्ट देव जी की सेवा मे कुछ पुष्प अर्पित कर सके। प्रत्येक कार्य के करने के लिये धन की आवश्यकता होती है इसी कारण एक अभियान चलाया गया और शीध्र ही लगभग सौ सदस्य बना लिये गये ताकि उक्त कम राशी से कुछ निर्माण कार्य की रूप रेरवा बन सके।

सबसे बड़ी समस्या जो सामने आ रही थी वह थी अक्रूर धाम की जमीन के दस्तावेजों का न मिलना । जमीन महासभा या ठाकुर गोपीनाथ जी के नाम है और चारों ओर एक परिक्रमा (बाउन्डरी) भी बनी है। गोस्वामियों के परिवार को जो इस मन्दिर की पूजा सदियों से देखते–करते आ रहे है, उन्हें भी साथ में लेना भी अति आवश्यक था। मुख्य सड़क से मन्दिर की दूरी लगभग एक–दो कि0मीटर है और सड़क टूटी–फूटी होने के कारण जाने में कठिनाई होती है। इसी कारण यह कार्य भी प्राथमिकता से करने की आवश्यकता थी। ऐसी कई प्राथमिकताओं को समक्ष रखकर फाउन्डेशन के प्रथम पदाधिकारियों को एक वर्ष के लिये चयन किया गया। श्री कृष्ण नन्दन वार्ष्णेय जो कि पटना निवासी है और समाज की सेवा में भी अग्रणी रहते है। उनको अध्यक्ष पद पर आसीन किया गया और मन्त्री पद नोयडा निवासी श्री पुष्पेन्द्र नाथ वार्ष्णेय को दिया गया। उपाध्यक्ष के पद पर श्री ज्ञान चन्द्र गुप्ता दिल्ली और श्री मदन मोहन अपना वाले हाथरस को सुशोभित किया गया।

चार मुख्य प्राथमिकतायें सोची गयी

1. गोस्वामी परिवार के साथ अनुबन्धन
2. सड़क का निर्माण
3. मन्दिर निर्माण की योजना एवं स्वरूप तैयार कराना
4. निर्माण आरम्भ कराना