देव प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा , भक्ति और प्रेम का अनूठा संगम

श्री वार्ष्णेय समाज की आध्यात्मिक चेतना, धार्मिक आस्था और विश्वास का केन्द्र श्री वार्ष्णेय मंदिर का गर्भगृह और मुख्य भवन (प्रथम तल का विशाल हॉल) जब भव्य और आकष्रक रूप में बनकर तैयार हो गये, तब मंदिर-निर्माण में लगे सेवा भावी कार्यकर्ताओं ने निर्णय किया कि जयपुर के अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कारीगरों द्वारा श्वेत संगमरमरी पत्थर से तराशी गईं योगीराज श्री कृष्ण, श्री लक्ष्मी नारायण, श्री सीताराम-लक्षमण-हनुमान एवं अन्य देवी देवताओं की भव्य एवं अलौकिक प्रतिमाओं का शुभ मुहूर्त में प्राण-प्रतिष्इा कराई जाय। धार्मिक आचार्यों की सलाह पर इस भव्य आयोजन हेतु चैत्र शुक्ला त्रयोदशी सं. 2057 तद्नुसार 16 अप्रैल, 200 दिन रविवार की शुभ तिथि निश्चित की गई। इस प्रकार वर्ष 200 के जनवरी मास से ही प्रभावी तैयारियाँ प्रारम्भ कर दी गईं। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को भव्यता प्रदान करने व निर्विघ्न सम्पन्न कराने की दृष्टि से कई समितियों का गठन किया गया और इस शुभ अवसर पर सम्पन्न कराये जाने वाले सभी आयोजनों और कार्यक्रमों को दिनांक 12 अप्रैल से 16 अप्रैल, 200 तक पाँच दिनों में समायोजित किया गया। चैत्र शुक्ला त्रयोदशी दिन रविवार की शुभ तिथि, जिस दिन पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से भव्य देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा हुई, मन्दिर के इतिहास में अविस्मरणीय रहेगी एवं स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा पूर्ण विधि-विधान से ख्यातिप्राप्त संस्कृत महाविद्यालय, नरवर के प्रमुख आचार्यों द्वारा सम्पन्न कराई गई। पाँच दिनों तक लगातार चले धार्मिक आयोजनों के दौरानसम्पूर्ण महानगर श्रद्धा, भक्ति और प्रेम के अद्भुत संगम में गोते लगाता रहा। यथार्थतः महानगर के सम्पूर्ण जनमानस ने इन आयोजनों में पूर्ण मनोयोग से भाग लिया। वार्ष्णेय समाज ने तो अपने प्रतिष्ठानों और भवनों को दीवाली की भाँति विविध प्रकार से सजाया था। कहीं मनभावन रंगोलियाँ सौन्दर्य प्रकीर्ण कर रहीं थीं तो कहीं रंग बिरंगी झालरों और दीपमालिकाओं से सुशोभित महानगर इन्द्रलोक का आभास करा रहा था। लगभग 150 तोरण द्वारों से सजाये गये महानगर के प्रमुख मार्ग अपनी अनूठी छटा बिखेर रहे थे। मन्दिर-मार्ग के विशालकाय प्रवेश द्वार को भाँति-भाँति की झालरों, झाड़-फनूसों और रंग बिरंगे पुष्पों की मालाओं आदि से सजाकर एवं मंगल-कलश लगाकर ऐसा भव्य और आकर्षक स्वरूप प्रदान किया गया था मानों हम इन्द्रपुरी के प्रवेश द्वार के साक्षात् दर्शन कर रहे हों। इस विशाल एवं भव्य प्रवेश द्वार के शीर्ष पर विराजमान श्री अक्रूर जी महाराज की प्रतिमा अलौकिक आनन्द की अनुभूति करा रही थी। प्रवेश द्वार से लेकर मन्दिर तक का सम्पूर्ण मार्ग विविध प्रकार की झालरों और बिजली के रंगाविरंगे बल्वों से झिलमिला रहा था। मन्दिर का मुख्य प्रवेश द्वार की पुष्प मालाओं, रंगबिरंगी झालरों और बन्दनवारों से अनूठी साज-सज्जा की गई थी, जो राह चलते पथिकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। सुगन्धित पुष्पों का स्पर्श कर एवं इत्र और चन्दनयुक्त जल के कृत्रिम झरनों के पास से गुजरने वाली शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चैत्र मास की उष्णता को शीतलता प्रदान कर मन्दिर-परिसर को वसन्ती वयार का आगाज करा रही थी। साथ ही परिसर में कलात्मक रूप से सजाई गई दीपमालिकाएँ एवं बिजली की विविध प्रकार की झालरें तथा रंगबिरंगे पुष्पों की मालायें मन्दिर की भव्यता में चार चाँद लगा रही थीं, कदाचित ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम अलौकिक आभा से आच्छादित आध्यात्मिक नगरी में विचरण कर रहे हों। मंदिर के विशाल आँगन और सीढ़ियों पर सजाई गईं मनभावन रंगोलियँ एवं रेलिंग पर लहराती हुई पुष्पों और पल्लवों की लड़ियाँ (लटकनें) इस स्वार्गिक सौन्दर्य को द्विगुणित कर रही थीं। श्री अक्रूर भवन के पार्श्व में खुले आँगन में प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण विशाल यज्ञशाला एवं धार्मिक अनुष्ठान केन्द्र का निर्माण कराया गया था, जहाँ आचार्यगण वेद-ऋचायें गाकर धर्मोपदेश करते हुए देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा के सभी धार्मिक अनुष्ठानों को जयमानों के द्वारा पूर्ण करा रहे थे। प्राण-प्रतिष्ठा के इस भव्य आयोजन में भाग लेने हेतु नगर और नगर के बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के संख्या-बत को ध्यान में रखते हुए आयोजकों ने उनके आवागमन की सुगमता की दृष्टि से वाहनों का पार्किंग स्थल मंदिर-मार्ग के प्रवेश द्वार के सन्निकट स्थित हीरालाल बारहसैनी इण्टर कालिज के क्रीड़ा-स्थल को बनवाया था। यही नहीं प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर सम्पन्न होने वाले अन्य अनेक कार्यक्रमों में जनसमूह के दबाव को ध्यान में रखते हुए तीन अलग-अलग स्थानों- श्री वार्ष्णेय मंदिर का श्री अक्रूर भवन, श्री वार्ष्णेय महाविद्यालय का बास्केटगाल मैदान एवं विशाल क्रीड़ास्थल पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए। जनसमूह की सुविधा के लिए इन सभी स्थानों पर प्रकाशध् ध्वनि एवं बैठने की समुचित व्यवस्था की गयी थी। क्रीड़़ा स्थल पर होने वाले कार्यक्रमों के लिए विशाल मंच तैयार कराया गया था जिसको क्रत्रिम झरनों, कलात्मक पर्वत शिखरों, पेड़-पौधों और पुष्पों ये अत्यन्त आकर्षक बनाया गया था। सभी कार्यक्रमों की दर्शों और आगन्तुकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्राण-प्रतिष्ठा आयोजकों की स्म्तियों को मानस-पटल पर ऐसा अंकित कर दिया है, जिसका कभी विस्मरण नहीं हो सकता। प्रस्तुत है कुछ कार्यक्रमों का विवरण जो समाज स्मृति पटल पर सदैव बने रहेंगे।

पूजा-अर्चना-

श्री वार्ष्णेय मंदिर में देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा का आयोजन शुभ तिथि चैत्र शुक्ला श्री राम नवमी सं. 2057 तद्नुसार 12 अप्रैल 2000 को प्रातःकाल विद्याविनायक श्री गणेश जी की पूजा-अर्चना एवं कलश पूजन से प्रारम्भ हुआ। बद्रिकाश्रम पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद श्री माधवाश्रम जी महाराज के निर्देशानुसार संस्कृत महाविद्यालय, नरवर के प्रमुख आचार्यों द्वारा विधि-विधान से श्री गणेश जी का पूजन कराया गया एवं सभी यजमानों से कलश पूजन कराया। तदोपरान्त पीत-परिधानों से सजी-सँवरी माताओं-बहिनों ने शुभ कलश-यात्रा प्रारम्भ की, जो मंदिर प्रांगण से प्रारम्भ होकर गांधी नगर, प्रीमियर नगर, हाथरस अड्डा, द्वारिका पुरी एवं अचल सरोवर की परिक्रमा कर मंदिर-परिसर में आकर सम्पन्न हुई। पंक्तिबद्ध सजी-धजी बहिनों के सिर पर अनुपम कलाकृतियों से सजे कलश अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। अन्य श्रद्धालु रामधुन गाते हुए कलष-यात्रा में साथ-साथ चल रहे थे। कलश यात्रा में भजन-कीर्तन से सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया था। विभिन्न स्थानों पर लोगों ने पुष्प वर्षा कर कलश-यात्रा का स्वागत किया तथा कई स्थानों पर प्रसाद वितरण भी किया। कलश-यात्रा सम्पन्न होने के उपरान्त अपरान्ह में आचार्यों ने वेद मंत्रों का सस्वर गायन कर सभी यजमानों से धार्मिक अनुष्ठान कराया और सभी देव प्रतिमाओं का जलाधिवास कराया। इस अवसर पर अनेक श्रद्धालुओं और भक्तों ने उपस्थित होकर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। रात्रि को आचार्यों के प्रवचन हुए।

दूसरे दिन चैत्र शुक्ला दशमी को श्री गणेश वन्दना के बाद यज्ञ की वेदियों की स्थापना कराई गई तथा पूजन किया गया और अरणी-मंथन द्वारा अग्नि की स्थापना की गई। देव प्रतिमाओं का अन्नाधिवास कराया गया। मान्यता है- अन्न से जीव में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसी हेतु प्राण-प्रतिष्ठा से पूर्व प्रतिमाओं का अन्नाधिवास कराया जाता है।

तीसरे दिन दिनांक 14 अप्रैल को आचार्यों ने श्री गणेश वन्दना के उपरान्त यजमानों द्वारा यज्ञ-वेदियों का पूजन कराया और वेद मंत्रोच्चार करके यज्ञ प्रारम्भ कर किया। सभी देव प्रतिमाओं को क्रमशः घृताधिवास, पुष्पाधिवास एवं फलाधिवास कराया गया। मान्यता है- घृताधिवास ऊर्जा एवं विशेष शक्ति प्रदान करने हेतु एवं पुष्पाधिवास व फलाधिवास जीव को पुष्टि एवं बल प्रदान करने हेतु कराये जाते हें।

चौथे दिन मंत्रोचार के साथ श्री गणेश पूजन सहित सभी यज्ञ-वेदियों का पूजन एवं यजमानों द्वारा यज्ञ में आहुतियाँ दी गईं। देव प्रतिमाओं को क्रमशः गन्धाधिवास एवं धूपाधिवास द्वारा प्रतिमाओं को तेजोमय एवं गन्धमय बनाया गया तथा भोग के लिए मिष्ठानाधिवास एवं वस्त्राधिवास कराके प्रतिमाओं को वस्त्र अर्पित किए गये और शयन हेतु शय्याधिवास कराया गया। इसी दिन पूर्वान्ह 11 बजे से सभी देव प्रतिमाओं का नगर-भ्रमण कराया गया, जिसका विवरण आगे दिया गया है।

पाँचवे दिन चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को प्रातः काल यजमानों द्वारा श्री गणेश पूजन एवं यज्ञ-वेदियों का पूजन किया और यज्ञ में आहुतियाँ डालीं। सभी देव-प्रतिमाओं का ‘न्यास’ कराया गया, अर्थात् वेदमंत्रोच्चार करके प्रतिमाओं के अंग-प्रतिअंग में प्राण ढाले गये, तदोपरान्त उनको सिंहासनों पर विराजमान कर उनके हृदय पर अँगूठा रखकर वेद मंत्रों द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा की गई। तदोपरान्त भगवान ‘‘का प्रथम श्रंगार’’ दर्शन हुआ और प्रथम भोग कराया गया। भोग प्रसाद के रूप में अखण्ड भण्डारा हुआ, जिसमें नगर व बाहर के हजारों नर-नारियों ने पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रसाद ग्रहण किया। सांयकाल 7 बजे भगवान की प्रथम महाआरती के समय भक्तों और श्रद्धालुओं का जनसमूह उमड़ पड़ा। शंख और घड़ियालों की कर्णप्रिय ध्वनियों से सम्पूर्ण मंदिर-परिसर गूँज उठा। सभी उपस्थित श्रद्धालुओं ने भाव विभोर हो भगवान की आरती की और जै, जै कार की।

श्री कृष्ण लीला मंचन-

प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों की श्रंखला में प्रथम दिन अर्थात् श्री रामनवमी से लगातार तीन दिनों तक रात्रि 8 बजे से श्री वार्ष्णेय महाविद्यालय के बास्केट बॉल मैदान पर श्री कृष्ण लीला का मंचन हुआ। वृन्दावन के पं. देवकी नन्दन जी महाराज ‘रसाचार्य’ की प्रसिद्ध रास मण्डली के कलाकारों द्वारा श्री कृष्ण लीला का भावपूर्ण मंचन करके भक्तिरस की गंगा में दर्शकों को डुवकियाँ लगवाईं। लीला प्रारम्भ होने से पूर्व प्रतिदिन श्री राधा कृष्ण के बाल स्वरूपों की श्रद्धापूर्वक आरती होती। सभी दर्शक भाव विभोर हो झूमने लगते। तीन दिनों में कलाकारों ने श्री कृषण लीला की जिन लीलाओं का मंचन किया उनमें श्री कृष्ण का गोपियों के साथ महारास, मयूर नृत्य एवं ब्रज की होली के भावपूर्ण प्रदर्शन पर दर्शक झूम उठते थे। इसके अतिरिक्त श्री अक्रूर जी के साथ श्रीकृष्ण और बलराम के साथ मथुरा गमन एवं इस अवसर पर सम्पूर्ण गोकुलवासियों विशेष रूप से ग्वाल-बालों और गोपियों द्वारा उनको रोके जाने का दृश्य इतना भावुक और हृदयस्पर्शी था कि दर्शक अपनी आँखों से आँसू नहीं रोक पा रहे थे। पापियों का भगवान किस प्रकार नाश करते हें इसका मार्मिक प्रदर्शन श्री कृष्ण द्वारा पापी कंस का वध करके किया। इस अवसर पर श्रीकृष्ण की जय, श्री बलदाऊ की जय उद्घोष से सम्पूर्ण वातावरण गुँजायमान हो गया। रास मण्डली श्रीकृष्ण लीला का हृदयस्पर्शी मंचन करने के लिए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। महानगर के वार्ष्णेय युवा संगठन के लगनशील कार्यकर्ताओं ने व्यवस्था बनाये रखने में महत्वपूर्ण योग दिया।

संत समागम-

जगद्गुरु शंकराचार्य का सांस्कृतिक सानिध्य - बद्रिकाश्रम पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद श्री माधवाश्रम जी महाराज के श्री वार्ष्णेय मंदिर में देव प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के पावन अवसर पर आगमन से अलीगढ़ महानगर धन्य हो गया। उनका दर्शन करने व प्रवचन सुनने के लिए श्री अक्रूर भवन में श्रद्धालुओं का सैलाव उमड़ पड़ा। सभी श्रद्धालुओं ने जगद्गुरु का भावपूर्ण अभिवादन कर हिन्दू धर्म ध्वजा के अग्रेता एवं महान संत के दर्शन कर पुण्य प्राप्त किया। श्री माधवाश्रम जी महाराज ने अपने उद्वोधन में देश में बड़ रहे पश्चिमीकरण पर प्रहार करते हुए अपनी संस्कृति और धर्म को अपनाने के लिए आव्हान किया। हिन्दू धर्म की रक्षा करके ही हम भारत की अस्मिता को बचा सकते हैं और अपने गौरवशाली अतीत को पुनर्स्थापित कर सकते हैं। उन्होंने आगे कहा अपनी सनातन संस्कृति की रक्षा करने के लिए हमें श्री राम कृष्ण, शिवा और प्रताप के आदर्शों पर चलना होगा। जगद्गुरु ने भव्य मंदिर निर्माण कराने के लिए धर्माबलम्बी एवं सेवाभावी वार्ष्णेय समाज की भूरि-भूरि प्रशंसा की। अंत में श्रद्धालुओं ने शंकराचार्य की आरती करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया

देवरहा बाबा सरकार के शिष्य छोटे महाराज जी का दर्शन लाभ - ब्रह्मऋषि, ब्रह्मवेत्ता, सन्त शिरोमणि देवरहाबाबा सरकार के वृन्दावन स्थित आश्रम से पधारे उनके शिष्य छोटे महाराज जी (श्री रामसेवक जी महाराज) के चमत्कारी व्यक्तित्व के दर्शन करने को उनके शिष्यों एवं श्रद्धालुओं का जनशैलाव उमड़ पड़ा। उनके चरण स्पर्श करने और आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ सी लग रही थी। सारा शहर जैसे उनके दिव्य दर्शन करने को लालायति था। उनके साथ आई उनके भक्तों की भजन कीर्तन मण्डली ने गुरु वन्दना और भगवान की स्तुती के भजनों से एवं छोटे महाराज जी की मधुरवाणी ने दिव्य आनन्द की ऐसी गंगा बहाई कि सम्पूर्ण जनसमूह भाव विभोर हो थिरकने और मस्त हो नाचने लगा। भजन कीर्तन के उपरान्त श्री रामसेवक दास जी महाराज ने अपने अध्यात्मिक प्रवचन में कहा कि मानव को दीन दुःखी न होकर शक्तिशाली और ताकतवर बनना होगा। शक्ति की सर्वत्र पूजा होती है। समाज कल्याण और समरसता कायम करने के लिए जातीयता काबंधन तोड़ना होगा। बाबा कहते थे ‘गाय हमारी माँ है’ उसकी रखा करना हमारा कर्तव्य है, गौ हत्या बंद होनी चाहिए। देश को शक्तिशाली बनाने के लिए धर्म का अलख जगाना होगा। उन्होंने कहा कि वाष्णर्सेय समाज ने इस भव्य मंदिर का निर्माण करके धर्म के प्रति अपनी आस्था और विश्वास का परिचय दिया है। सम्पूर्ण ब्रज मण्डल में यह भव्य मंदिर भक्तों के लिए दर्शनीय पूजास्थल बनेगा।

भव्य देव प्रतिमाओं का नगर भ्रमण -

देव प्रतिमाओं का नगर भ्रमण अभूतपूर्व था।दिनांक 15 अप्रैल 2000 को सभी देवी देवताओं की प्रतिमाओं को  सजे धजे डोलों रामरथों में, नगर भ्रमण कराया गया, जो मंदिर प्रांगण से प्रातः 11 बजे से विशेष पूजा अर्चना के उपरान्त प्रारम्भ हुआ। देव प्रतिमाओं की इस शोभा यात्रा के साथ ज्ञद्धालुओं का अपार जन समूह राम कृष्ण तथा अन्य देवी देवताओं के भजन कीर्तन गाते हुए चल रहा था, जिससे सम्पूर्ण महानगर भजन, कीर्तन की सरस धुनों की सुरसर में जैसे गोते लगा रहा था। सभी कुछ राम, कृष्णमय लग रहा था। समाज के सभी नर-नारी विशेष परिधानों, पुरुष वर्ग सफेद धोती-कुर्ता एवं पीत अंग वस्त्रं तथा महिलाएँ पीली साड़ी में अद्भुत छटा बिखेर रहे थे। सम्पूर्ण महानगर को तोरणद्वारों, वन्दनवारों, झालरों, पुष्पाहारों से दुल्हन की तरह सजाया गया था। देव प्रतिमाओं की शोभा यात्रा जहाँ से भी गुजरती पुष्प वर्षा कर स्वागत किया जाता। जगह-जगह शोभा यात्रा को रोक कर फल, मिष्ठान, शर्बत, दूध, ठंडे पेय से सभी भक्तों का सत्कार किया जाता। एकओर सजे हुए रथ में मंदिर का आकर्षक मॉडल शोभायात्रा के आगे-आगे दर्शकों को आकर्षित कर रहा था, तो दूसरी ओर अक्रूर जी महाराज के रथ को खींचते हुए श्रद्धालु आकर्षण का केन्द्र थे। शोभा यात्रा में योगीराज श्री कृष्ण, श्री राम दरबार, श्री लक्ष्मी नारायण, माँ दुर्गा, माँ गौरी, माँ काली, माँ गंगा, माँ सरस्वती, माँ गायत्री, नरसिंह अवतार, कल्कि अवतार, शेषावतार, परुशराम अवतार, कच्छप अवतार तथा मत्सावतार के सजे हुए डोले विविध प्रकार से सजाये गये थे। शोभा यात्रा श्री वार्ष्णेय मंदिर से प्रारम्भ होकर जी.टी.रोड, गाँधीपार्क, चौराहा माल गोदाम, सुभाष मार्ग, अप्सरा सिनेमा से गाँधी मार्ग (ढपरा रोड), सराय हकीम, बारद्वारी, नन्दन टॉकीज मार्ग, देहली गेट चौराहा, कनवरीगंज, कटरा स्ट्रीट, महावीर गंज, हनुमान मंदिर, बारहद्वारी, पत्थर बाजार, चौराहा मीरीमल, मामूभाँजा रोड, आगरा रोड, थाना गाँधीपार्क, पड़ाव दुबे, चौराहा मदार गेट, आर्य समाज मंदिर मार्ग, अचलताल मार्ग, मंदिर गिलहराज जी, हाथरस अड्डा, रायल सिनेमा मोड़, पालीवाल इण्टर कालिज, रामलीला ग्राउण्ड से श्री वार्ष्णेय मंदिर में सम्पन्न हुई।

देवी जागरण-

लोगों की भक्ति भावना एवं माँ भगवती के प्रति आस्था को ध्यान में रख प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के आयोजकों ने उस अवसर पर एक राष्ट्रय स्तर के कलाकार से देवी जागरण कराने का निश्चय किया था। अतऐव सारे महानगर में दिनांक 15 अप्रैल को श्री वार्ष्णेय महा विद्यालय के विशाल क्रीड़ा स्थल पर होने वाले देवी जागरण की चर्चा थी, क्योंकि देवी जागरण करने आ रहे थे अपनी पार्टी के साथ देश के प्रसिद्ध भजन गायक एवं टी. सीरिज के कलाकार श्री लखबीर सिंह लक्खा जिन्हों ने अपनी गायकी से देश के जन-जन के हृदय में एक विशिष्ठ स्थान बना रखा है। देवी जागरण के लिए उसके अनुरूप विशाल मंच बनाया गया था, जिसे प्राकृतिक स्वरूप प्रदान करने के लिए कृत्रिम झरनों, सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ, पेड़-पौधों और पुष्पों से सजाया गया था। दर्शकों को बैइने के लिए भी बहुत अच्छी व्यवस्था की गई थी। जनसैलाव को नियंत्रित एवं व्यवस्थित रखने हेतु दिल्ली से विशेष सुरक्षाबल की व्यवस्था की गई थी। मंच पर हो रहा कार्यक्रम सभी को शुलभ हो इसके लिए लाइट व साउण्ड की उच्चस्तरीय व्यवस्था की गई थी। स्थानीय टी.वी. चेनल से कार्यक्रम का सीधा प्रसारण भी कराया जा रहा था। जिससे घर बैठे ही लोग देवी जागरण का आनन्द ले सकें। अलीगढ़ के अब तक के इतिहास में दर्शकों की इतनी भीड़ कभी नहीं देखी गई थी। सुरक्षा व्यवस्था इतनी चुस्त-दुरस्त थी कि इतनी अधिक भीड़ होने पर भी सम्पूर्ण कार्यक्रम शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश के लिए गेटपास दिये गये थे, जिससे मैदान पर दर्शकों की भीड़ नियंत्रण में रहे, फिर भी एक लाख से अधिक लोगों ने देवी जागरण का आनन्द लिया। लक्खा जी की गायकी इतनी मधुर एवं कर्णप्रिय थी कि दर्शक रातभर झूमते रहे और भजनों का आनन्द लेते रहे।

अखिल भारतीय हास्य कवि सम्मेलन-

श्री वार्ष्णेय युवा संगठन के सद्प्रयासों से दिनांक 16 अप्रैल रात्रि 9 बजे से अखिल भारतीय हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इस कवि सम्मेलन में राष्ट्रय स्तर के कवियों श्री बैंकट बिहारी ‘पागल’, डा॰ वीरेन्द्र तरुण, डा॰ मंजू दीक्षित, सुश्री मधुमिता शुक्ला, सुश्री चेतना शर्मा, श्री प्रेम किशोर पटाखा, श्री मुरसानी, श्री खुश दिल, श्री अलबेला, श्री सम्वेदिन एवं वेदप्रकाश ‘मणि’ ने हास्य व्यंग की रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं को आनन्दित किया। कवियों ने अपनी कविताएँ सुनाकर ऐसा समाँ बाँधा कि श्रोतागण भोर होने तक हास्यरस की अविरलधारा में डुबकियाँ लगाते रहे। तालियों और वंशमोर-वंशमोर के उद्घोष से कवियों का उत्साहवर्धन करते ररहे और आनन्द लेते रहे।

देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर आयोजित पाँच दिनों तक अनवरत चले ये कार्यक्रम इतने मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी थे कि आने वाले वर्षों तक उनकी स्मृतियाँ हमारे हृदय पटल पर अंकित रहेंगी। यही नहीं प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के यादगार क्षणों को श्री वार्ष्णेय मंदिर के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जायेगा। कार्यक्रम व्यवस्थापक होने के नाते मैं अपने सीाी सहयोगी कार्यकर्ताओं, सहृदय दानदाताओं, संतों, आचार्यों, महानगर के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों एवं जनता का दिल की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने पूर्ण निष्ठा और लगन से मन्दिर के इस धार्मिक आयोजन को सम्पन्न कराने में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान किया।